हर साल कार्तिक मास में देवउठनी एकादशी के आसपास देशभर में तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। तुलसी माता को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, लाल चुनरी ओढ़ाई जाती है, मंगलगीत गाए जाते हैं और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के साथ उनका प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई?
इसके पीछे वृंदा, उनके पति जलंधर और भगवान विष्णु से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा प्रचलित है, जिसमें भक्ति, शक्ति, छल, श्राप और वरदान—सभी का वर्णन मिलता है।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जिस वृंदा ने भगवान विष्णु को छल के कारण श्राप दिया, उसी वृंदा का तुलसी रूप में भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप से विवाह कराया जाता है।
आइए समझते हैं इस कथा और इसके पीछे छिपे प्रश्नों को।
कौन थीं वृंदा और जलंधर?
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, वृंदा दैत्य कालनेमि की पुत्री थीं। बचपन से ही वे भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उनका विवाह जलंधर नामक शक्तिशाली असुर से हुआ था।
जलंधर की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। कुछ कथाओं में उसे समुद्र से उत्पन्न बताया गया है, जबकि अन्य कथाओं में उसकी उत्पत्ति भगवान शिव के तेज से जुड़ी है।
जलंधर अत्यंत पराक्रमी था। उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि देवताओं के लिए उसे पराजित करना कठिन हो गया।
कथा के अनुसार, जलंधर की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता और तपस्विनी थीं। उनके तप और पतिव्रत की शक्ति जलंधर के लिए रक्षा-कवच बन गई थी।
मान्यता थी कि जब तक वृंदा का पतिव्रत अक्षुण्ण रहेगा, तब तक जलंधर को युद्ध में पराजित करना संभव नहीं होगा।
जब देवताओं के लिए जलंधर को हराना कठिन हो गया
पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि जलंधर के बढ़ते प्रभाव से देवता चिंतित हो उठे।
कई कथाओं में जलंधर का युद्ध भगवान शिव से बताया गया है, जबकि कुछ लोकप्रचलित वर्णनों में भगवान विष्णु के साथ उसके संघर्ष का उल्लेख मिलता है।
जब जलंधर को पराजित करने का कोई उपाय नहीं दिखाई दिया, तब उसकी शक्ति के रहस्य पर विचार किया गया।
कथा के अनुसार, जलंधर की अजेयता का संबंध वृंदा के पतिव्रत और तपोबल से था।
यहीं से कहानी एक ऐसा मोड़ लेती है, जो आज भी कई नैतिक प्रश्न खड़े करता है।
भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप क्यों धारण किया?
एक प्रचलित कथा के अनुसार, जलंधर की रक्षा करने वाली शक्ति को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया।
वे वृंदा के सामने उनके पति के रूप में उपस्थित हुए।
वृंदा उन्हें पहचान नहीं सकीं। कथा में इस छल से उनके पतिव्रत के भंग होने का वर्णन मिलता है।
इसके बाद जलंधर की रक्षा करने वाली शक्ति समाप्त हो गई और वह युद्ध में मारा गया।
लेकिन जब वृंदा को वास्तविकता का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुईं।
जिस भगवान विष्णु की वे बचपन से आराधना करती आई थीं, उन्हीं के द्वारा छल किए जाने की बात उनके लिए असहनीय थी।
वृंदा ने भगवान विष्णु को क्या श्राप दिया?
कथा के अनुसार, वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया—
“जिस प्रकार आपने मेरे विश्वास को तोड़ा है, उसी प्रकार आप भी पत्थर बन जाएँ।”
एक प्रचलित मान्यता में भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप को इसी श्राप से जोड़ा जाता है।
हालाँकि वृंदा के श्राप के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं। कुछ कथाओं में भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया गया है, जबकि अन्य कथाओं में उनके भविष्य के अवतार में पत्नी-वियोग का उल्लेख मिलता है।
कथा के आगे के प्रसंग में वृंदा के दुखी होकर शरीर त्यागने और अग्नि में प्रवेश करने का वर्णन मिलता है।
कुछ लोककथाओं के अनुसार, उनकी भस्म से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ।
भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि वे तुलसी के रूप में संसार में पूजनीय होंगी और उनकी पूजा में तुलसी का विशेष स्थान होगा।
देवउठनी एकादशी से क्या है तुलसी विवाह का संबंध?
हिंदू मान्यता के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।
कार्तिक शुक्ल एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण का उत्सव मनाया जाता है। इसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।
इसके साथ ही अनेक हिंदू समुदायों में विवाह जैसे मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत मानी जाती है।
इसी समय तुलसी विवाह का आयोजन भी होता है। कई परिवार इसे एकादशी पर और कई द्वादशी के दिन संपन्न करते हैं।
तुलसी विवाह को नए मांगलिक मौसम का प्रतीकात्मक पहला विवाह भी कहा जाता है।
इस दिन तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। शालिग्राम या भगवान विष्णु की प्रतिमा को वर के रूप में स्थापित किया जाता है।
गन्ने का मंडप, फूलों की सजावट, मंगलगीत, आरती और प्रसाद के साथ यह उत्सव परिवार के सभी सदस्यों की सहभागिता से मनाया जाता है।