बेटी ने माँ-बाप की संपत्ति में हिस्सा माँगा तो रिश्ते क्यों बदल गए?क्या बेटी अपना हक़ माँग ले, तो मायका उसका नहीं रहता?
दिवाली आने में अभी तीन दिन बाकी थे। सिया ने सुबह-सुबह बालकनी के पर्दे हटाए तो सामने वाली सोसायटी रंग-बिरंगी झालरों से जगमगा रही थी। नीचे बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं। कोई पटाखों की बातें कर रहा था, कोई रंगोली के रंग लेकर जा रहा था। हवा में भी जैसे त्योहार उतर आया था।
उसने चाय का कप हाथ में लिया और कुछ देर बाहर खड़ी रही। तभी मोबाइल पर WhatsApp notification आया।
“भैया”
एक पल के लिए उसका चेहरा खिल उठा। उसने जल्दी से फोन खोला।
लेकिन message बड़े भैया का नहीं था। Family group में किसी रिश्तेदार ने दिवाली की शुभकामनाओं वाला video भेजा था। सिया ने फोन बंद कर दिया।
तीन साल हो गए थे माँ को गए हुए। पापा माँ से दो साल पहले चले गए थे। उनके रहते कभी उसे यह सोचना ही नहीं पड़ा था कि दिवाली पर मायके से कौन आएगा।
माँ तो सितंबर से ही पूछना शुरू कर देती थीं—
“इस बार दिवाली पर क्या पहन रही है? बच्चों को क्या चाहिए? और सुन, मिठाई मत खरीदना। तेरे पापा खुद लेकर आएंगे।”
पापा हँसकर कहते—“तुम्हारी माँ को लगता है इसकी ससुराल में मिठाई मिलती ही नहीं।”
और फिर दिवाली से एक-दो दिन पहले पापा या दोनों भाइयों में से कोई न कोई मिठाई, फल, बच्चों के कपड़े और शगुन लेकर आ जाता।
सिया हर बार माँ से कहती—“इतना सब क्यों भेजती हो?”
माँ का जवाब हमेशा एक ही होता— “बेटी के घर त्योहार पर मायके से कुछ पहुँचे तो उसे सामान नहीं कहते। उसे याद कहते हैं।”
आज घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। उसका पति निखिल अच्छी नौकरी में था। बच्चे बड़े हो रहे थे। घर सुंदर था। बाजार से मिठाई मँगाने के पैसे भी थे और अपने लिए साड़ी खरीदने की हैसियत भी।
कमी बस उस “याद” की थी।
शाम को सिया अपनी बेटी अन्वी के साथ दीये रंग रही थी। अन्वी ने अचानक पूछा—“मम्मा, इस बार मामा कब आएंगे?”
सिया का हाथ रुक गया।“देखते हैं बेटा… सब busy होंगे।”
“पिछली दिवाली भी नहीं आए थे।”सिया मुस्कुराई, “काम होगा।”
“नानी होतीं तो?”-यह सवाल छोटा था, लेकिन सिया के भीतर बहुत गहराई तक उतर गया।
उसने सामने रखे दीये को देखते हुए कहा—“नानी होतीं तो अब तक तीन बार फोन कर चुकी होतीं।”
अन्वी हँस पड़ी।सिया भी हँसी, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं।
निखिल दूर से सब सुन रहा था।रात में उसने कहा—“फोन कर लो अपने भाइयों को।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम इंतज़ार कर रही हो।”
“मैं क्यों फोन करूँ? त्योहार पर फोन करना क्या सिर्फ बहन की जिम्मेदारी है?”
निखिल चुप हो गया। उसे पता था कि बात सिर्फ दिवाली की नहीं थी। इसके पीछे तीन साल पुरानी वह घटना थी जिसने सिया और उसके भाइयों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे किसी ने तोड़ने की कोशिश नहीं की।
पापा के जाने के बाद माँ पुश्तैनी घर में रहती थीं। दोनों भाई अपने परिवारों के साथ उसी शहर में थे। सिया की शादी दूसरे शहर में हुई थी।
माँ के रहते घर अब भी “मायका” था। सिया आती तो माँ कहतीं—
“यह तेरा घर है, पूछकर क्यों आती है?”
माँ के जाने के कुछ महीने बाद पहली बार परिवार बैठा। घर, जमीन और बैंक में जमा थोड़े-बहुत पैसे की बात हुई।
बड़े भैया ने सहजता से कहा—
“घर हम दोनों भाइयों के नाम करवा लेते हैं। सिया को तो हमने शादी में सब दिया ही था।”
सिया कुछ पल चुप रही।फिर उसने पूछा—
“और मेरा हिस्सा?”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।जैसे उसने कोई ऐसी बात कह दी हो जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।
छोटे भैया ने उसकी ओर देखा—
“तुझे हिस्सा चाहिए?”
उसके स्वर में प्रश्न कम, हैरानी ज्यादा थी।सिया ने धीरे से कहा—
“हाँ। जो कानूनी रूप से और माँ-पापा की संतान होने के नाते मेरा है।”
भाभी बोलीं—“दीदी, आपको किसी चीज़ की कमी है क्या?”
सिया को यह सवाल आज भी याद था।उसने कहा था—
“बात कमी की नहीं है।”
बड़े भैया का चेहरा उतर गया।
“हमने कभी सोचा नहीं था कि तू हमारे साथ ऐसा करेगी।हमारे साथ ऐसा करेगी?“
सिया उस वाक्य को बहुत दिनों तक समझ नहीं पाई।उसने किसी से कुछ छीना नहीं था। वह बस अपने हिस्से की बात कर रही थी। लेकिन अचानक वह बहन से “हिस्सा माँगने वाली बेटी” बन गई।
रिश्तेदारों तक बात पहुँची।
किसी ने कहा—“इतना अच्छा घर है उसका, फिर भी भाइयों से हिस्सा ले लिया।”
किसी ने कहा—“माँ-बाप ने शादी में कम खर्च किया था क्या?”
बुआ ने तो सीधे कह दिया—“बेटियों को मायका बचाकर रखना चाहिए, जमीन नहीं माँगनी चाहिए।”
उस दिन सिया ने पहली बार सोचा था—
क्या मायका बचाने की कीमत अपना अधिकार छोड़ना है?
यह सच था कि सिया आर्थिक रूप से ठीक थी। लेकिन क्या अधिकार केवल उसे मिलता है जिसे पैसों की जरूरत हो?
उसके पिता ने तीनों बच्चों को पढ़ाया था।दोनों भाइयों की तरह सिया भी उसी आँगन में पली थी। उसी छत के नीचे उसने परीक्षाओं की तैयारी की थी। उसी अमरूद के पेड़ पर चढ़ी थी। उसी घर की दीवार पर उसकी ऊँचाई के निशान बने थे।
फिर माता-पिता के जाने के बाद अचानक वह घर सिर्फ बेटों का कैसे हो गया?
अंततः संपत्ति का बँटवारा हुआ।सिया ने अपना हिस्सा लिया।
लेकिन उस हिस्से के साथ जैसे उसके हिस्से के रिश्ते कम होते चले गए।
फोन छोटे हो गए।Family group में formal wishes रह गईं। राखी courier से जाने लगी। भाइयों का उसके शहर आना लगभग बंद हो गया।
और त्योहार…
त्योहार सबसे ज्यादा चुभने लगे।
दिवाली से एक दिन पहले सिया सुबह जल्दी उठ गई। उसने बेसन के लड्डू बनाए। निखिल ने पूछा—
“इतने सारे?”
“बच्चों को पसंद हैं।”
लेकिन दोनों जानते थे कि सिर्फ बच्चों के लिए इतने लड्डू नहीं बने थे।
उसने guest room की चादर भी बदल दी।
“क्यों?” निखिल ने मुस्कुराकर पूछा।
“दिवाली है। घर साफ होना चाहिए।”
दोपहर तक हर बार lift की आवाज़ पर सिया का ध्यान दरवाज़े की ओर जाता।
कभी courier वाला।
कभी पड़ोसी।
कभी बच्चों के दोस्त।
शाम को doorbell बजी। इस बार वह लगभग दौड़कर गई। दरवाज़ा खोला।
सामने delivery boy था।
“मैम, आपका parcel।”
एक corporate gift hamper था—निखिल के office से।
सिया ने box लिया और dining table पर रख दिया।
इतना बड़ा hamper था—dry fruits, chocolates, candles, decorative tray।
सब कुछ था। बस वह छोटी-सी मिठाई की डिब्बी नहीं थी जिस पर माँ कभी लाल पेन से लिख देती थीं—
“सिया के लिए।”
दिवाली की शाम सिया ने सुंदर लाल साड़ी पहनी। घर में पूजा हुई। बच्चों ने दीये जलाए। निखिल ने तस्वीरें खींचीं। सब कुछ खूबसूरत था। फिर भी उसके भीतर कोई कोना अँधेरा था।
रात करीब आठ बजे फोन बजा। बड़े भैया का नाम screen पर चमका। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
“हैलो भैया…”
“Happy Diwali.”
“Happy Diwali भैया।”
“सब ठीक?”
“हाँ।”
“बच्चे?”
“ठीक हैं।”
“अच्छा… चल, पूजा का समय है। बाद में बात करते हैं।”
फोन कट गया। कुल चालीस-पैंतालीस सेकंड।सिया काफी देर screen देखती रही। फिर WhatsApp खोला। छोटे भैया का message था—
Happy Diwali to you and family 🪔
उसने reply किया— Same to you.
बस।
जिन भाइयों के साथ कभी दिवाली की रात पटाखे खत्म नहीं होते थे, अब उनसे बातचीत शब्द खत्म होने से पहले खत्म हो जाती थी।
अन्वी पास आकर बैठ गई।“मम्मा, आप sad हो?”
“नहीं।”
“आप झूठ बोल रही हो।”सिया मुस्कुरा दी।बच्चे शायद चेहरे पढ़ना हमसे बेहतर जानते हैं।
अन्वी ने पूछा—“मामा आपसे नाराज़ हैं?”
सिया ने पहली बार बेटी की आँखों में देखकर कहा—
“शायद।”
“क्यों?”
वह क्या बताती? क्या कहती कि नाना-नानी के जाने के बाद उनकी संपत्ति में उसने अपना हिस्सा माँगा था?
लेकिन फिर उसने सोचा—अगर आज वह सच छिपाएगी, तो शायद वही सोच अगली पीढ़ी तक पहुँच जाएगी।उसने कहा—
“नाना-नानी के बाद उनकी कुछ property थी। उसमें मम्मा ने भी अपना हिस्सा लिया।”
“तो?”
अन्वी का यह छोटा-सा “तो?” सिया को भीतर तक हिला गया।
वास्तव में—तो?
बच्ची को इसमें असामान्य कुछ दिखाई ही नहीं दिया।
“बस… शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा।”
अन्वी कुछ देर सोचती रही।फिर बोली—
“लेकिन आप भी तो नाना-नानी की बच्ची थीं।”
सिया की आँखों से आँसू निकल पड़े। इतनी बड़ी बहस का इतना छोटा उत्तर!
“आप भी तो उनकी बच्ची थीं।”
अगली सुबह सिया ने वर्षों पुराना एक box निकाला। उसमें माँ की कुछ साड़ियाँ, चिट्ठियाँ और तस्वीरें थीं। एक पुरानी diary के बीच छोटा-सा कागज मिला।माँ की लिखावट थी—
“मेरे तीनों बच्चे हमेशा मिल-जुलकर रहें। घर-जमीन यहीं रह जाएंगे, रिश्ते साथ जाएंगे।”
सिया बहुत देर तक उस पर्ची को देखती रही।उसके मन में सवाल आया—
अगर माँ आज होतीं तो क्या कहतीं?
क्या वे उससे कहतीं—“बेटी, अपना हिस्सा छोड़ दे ताकि भाई नाराज़ न हों?”
या भाइयों से कहतीं—उसका हिस्सा देने से वह तुम्हारी बहन थोड़ी कम हो जाएगी?”
शायद माँ दोनों से कहतीं—“संपत्ति बाँटो, रिश्ता मत बाँटो।”
अगले दिन भाई दूज थी।सुबह सिया तैयार हुई।उसने पूजा की थाली निकाली। फिर वापस रख दी। निखिल ने कुछ नहीं पूछा। करीब ग्यारह बजे उसने दोनों भाइयों को video call किया।पहले किसी ने नहीं उठाया। कुछ देर बाद बड़े भैया ने वापस call किया।
“हाँ सिया?”
इस बार सिया की आवाज़ स्थिर थी।
“भैया, मुझे आपसे एक बात कहनी है।”
“बोल।”
“मैंने माँ-पापा की संपत्ति में अपना हिस्सा लिया था। मैंने आपसे आपका हिस्सा नहीं छीना था।”
उधर चुप्पी थी।सिया बोलती रही—
“अगर आपको उस बात का दुख है, तो हम बात कर सकते हैं। लेकिन अगर मेरे हिस्से की कीमत मेरा मायका है, तो यह सौदा मेरे लिए बहुत महँगा है।”
“तू फिर वही बात…”
“नहीं भैया। आज property की बात नहीं कर रही। रिश्ते की कर रही हूँ।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“माँ के बाद मैंने आप दोनों में अपना मायका ढूँढा था। मुझे मिठाई नहीं चाहिए थी। कपड़े नहीं चाहिए थे। शगुन नहीं चाहिए था। बस कभी दरवाज़े पर खड़े होकर कह देते—चल बहन, त्योहार है, मिलने आया हूँ।”
फोन पर फिर सन्नाटा था।
“मैं आपका इंतज़ार करती रही। हर त्योहार। हर राखी। हर भाई दूज। लेकिन अब नहीं करूँगी।”
भैया शायद कुछ कहना चाहते थे। सिया ने धीरे से कहा—
“इसका मतलब यह नहीं कि मैं रिश्ता तोड़ रही हूँ। बस अब अपने अधिकार के लिए अपराधबोध लेकर नहीं जीऊँगी।”
उसने फोन रख दिया।और वर्षों बाद उसे अपने भीतर अजीब-सी शांति महसूस हुई।
करीब पाँच बजे doorbell बजी। सिया kitchen में थी। अन्वी दौड़कर दरवाज़ा खोलने गई।
कुछ सेकंड बाद उसकी जोर से आवाज़ आई—
“मम्मा!”
सिया बाहर आई।दरवाज़े पर बड़ा भैया खड़ा था। हाथ में कोई बड़ा hamper नहीं था। बस एक छोटी-सी मिठाई की डिब्बी थी।
उसके पीछे भाभी और बच्चे। सिया वहीं रुक गई।
भैया ने उसकी ओर देखा।
दोनों के बीच बहुत-सी बातें थीं—शिकायतें, अहंकार, पुराने वाक्य, अधूरे फोन, तीन दिवालियाँ और कई राखियाँ।
भैया ने मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाया।
फिर जैसे कुछ याद आया, हाथ वापस खींच लिया।
“यह तेरे लिए नहीं।”
सिया ने आश्चर्य से देखा।
भैया की आँखें नम थीं।
“यह बच्चों के लिए है। तू तो अपना हिस्सा लेगी।”
एक पल की चुप्पी के बाद सिया हँस पड़ी।भैया भी हँस दिया।
शायद हर टूटे रिश्ते का अंत इतना सरल नहीं होता। कई घरों में कोई भाई उस शाम दरवाज़े पर नहीं आता। कई बहनें वर्षों इंतज़ार करती रहती हैं। कई परिवारों में संपत्ति का विवाद रिश्तों को हमेशा के लिए बदल देता है।