योगमाया का रहस्य: कृष्ण जन्माष्टमी का अनसुना अध्याय

कृष्ण जन्माष्टमी आते ही हमारे मन में एक परिचित दृश्य उभरता है—मथुरा की अंधेरी कारागार, आधी रात का समय, देवकी की गोद में जन्म लेते श्रीकृष्ण और वसुदेव का उन्हें यमुना पार कर गोकुल ले जाना। लेकिन इस पूरी कथा में एक ऐसा पात्र भी है, जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है—वह रहस्यमयी कन्या, जिसका जन्म उसी रात हुआ था।

आखिर वह कन्या कौन थी? वह कहां से आई थी? और जब कंस ने उसे मारने की कोशिश की तो वह उसके हाथों से निकलकर आकाश में कैसे प्रकट हो गई?

पौराणिक परंपरा में इस कन्या को योगमाया के नाम से जाना जाता है।

कथा के अनुसार, मथुरा का राजा कंस अत्यंत शक्तिशाली लेकिन क्रूर शासक था। अपनी बहन देवकी के विवाह के अवसर पर उसे आकाशवाणी सुनाई दी कि देवकी की आठवीं संतान उसके विनाश का कारण बनेगी।

भयभीत कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया। देवकी की संतानों का जन्म होते ही कंस उन्हें मार देता था। उसका उद्देश्य एक ही था—उस भविष्यवाणी को किसी भी तरह गलत साबित करना।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध) के अनुसार, श्रीकृष्ण के जन्म से पहले भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि वे व्रज में जाकर यशोदा के गर्भ से कन्या के रूप में जन्म लें।

आठवीं संतान के रूप में स्वयं श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। जन्म के समय कारागार में दिव्य प्रकाश छा गया और वसुदेव को निर्देश मिला कि वे बालक कृष्ण को गोकुल ले जाएं।

उस रात वसुदेव कृष्ण को लेकर गोकुल पहुंचे। वहां यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव कृष्ण को यशोदा के पास छोड़कर उस कन्या को अपने साथ मथुरा ले आए।

जब कंस को पता चला कि देवकी की आठवीं संतान जन्म ले चुकी है, तो वह तुरंत कारागार में पहुंचा। देवकी ने उसे समझाने की कोशिश की कि यह तो एक कन्या है, इससे उसे कोई खतरा नहीं।

लेकिन भय से ग्रस्त कंस ने उसकी बात नहीं मानी।

उसने उस नवजात कन्या को उठाया और उसे पत्थर पर पटककर मारने का प्रयास किया।

लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी कंस ने कल्पना भी नहीं की थी।

वह कन्या उसके हाथों से छूट गई और आकाश में जा पहुंची।

देखते ही देखते वह एक दिव्य देवी के रूप में प्रकट हुई। उसके हाथों में अस्त्र-शस्त्र थे और उसका स्वर अत्यंत प्रभावशाली था।

उसने कंस को चेतावनी दी—

“जिससे तुम्हें भय है, वह जन्म ले चुका है। वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है।”

कंस स्तब्ध रह गया।

जिस भविष्यवाणी को रोकने के लिए उसने निर्दोष शिशुओं तक की हत्या कर दी थी, वह उसके प्रयासों के बावजूद सच हो चुकी थी।

कंस के सामने प्रकट होने वाली देवी को भागवत में अनेक देवी-नामों से संबोधित किया गया है। विभिन्न धार्मिक परंपराओं में इस देवी की पहचान दुर्गा, कात्यायनी, वैष्णवी, चंडिका, एकानंशा या विंध्यवासिनी जैसे देवी-स्वरूपों से भी जोड़ी गई है।

वैष्णव विचार में योगमाया भगवान की अंतरंग शक्ति हैं, जो भक्त और भगवान के बीच प्रेम तथा दिव्य लीला को संभव बनाती हैं।

एक ओर कृष्ण को परमात्मा माना जाता है, दूसरी ओर वही परमात्मा व्रज में एक नटखट बालक बनकर माखन चुराते हैं, दोस्तों के साथ खेलते हैं और मां यशोदा से डांट खाते हैं।

वैष्णव परंपरा इस दिव्य प्रेमपूर्ण वातावरण को योगमाया की लीला से जोड़ती है।

जब हम जन्माष्टमी की रात बाल कृष्ण को झूला झुलाते हैं, मंदिरों में “नंद के घर आनंद भयो” गाते हैं और आधी रात को कृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं, तब उस रहस्यमयी कन्या को भी याद करना चाहिए।

क्योंकि कृष्ण जन्म की कहानी में वह केवल एक नवजात बालिका नहीं थीं।

वह उस दिव्य शक्ति का प्रतीक थीं जिसने कृष्ण की लीला के लिए परिस्थितियों को तैयार किया।

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