डोर बैल की आवाज से सुधा की नींद टूटी। घड़ी पर नजर पड़ी तो देखा सुबह के केवल 6 बजे थे।
” इतनी सुबह आखिर कौन हो सकता है ? वो भी होली के दिन।” ये सोचते हुए सुधा अलसाये कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी। दरवाजा खोला तो कामवाली बाई सत्तो खड़ी थी। इससे पहले कि सुधा कुछ बोलती , सत्तो रसोई की तरफ लपक कर बढ़ गई।
” आज इतनी सुबह कैसे ?” सुधा ने पूछा तो सत्तो ने बर्तन पोंछते हुए कहा -“आज होली है न बाई। आज जल्दी काम खत्म करके त्यौहार मनाने का है और हाँ ,आज मैं शाम को नहीं आएगी।”
” तेरा तो ये रोज का ड्रामा है। लगता है त्तेरी छुट्टी के पैसे काटने पड़ेंगे।” – सुधा ने आँखे दिखते हुए कहा। पर सत्तो पर ये धमकियां बेअसर थी।
“आप ही बताओ बाई, होली रोज़- रोज़ थोड़े ही न आती है। ये काम परिवार के साथ होली मनाने से ज़्यादा जरूरी है क्या ?” सत्तो के इस सवाल ने सुधा के होंठ सिल दिए। ठीक ही तो कह रही है बिचारी। एक दिन काम पड़ा रहेगा तो कौन सी दुनिया इधर से उधर हो जाएगी। कल आ कर सब समेट लेगी। ये सोचते हुए सुधा नहाने चली गयी।
दो साल पहले सुधा के पति रवि सरकारी सेवा से रिटायर हुए थे। उनकी इकलौती संतान दिवाकर विवाहित है और दूसरे शहर में रहता है। रिटायरमेंट के एक साल बाद तक तो सब ठीक रहा। कुछ महीने दोस्तों के साथ घूमने फिरने और रिश्तेदारों के भ्रमण में निकल गए . उसके बाद से सुधा को अकेलापन सताने लेगा। जब तक रवि नौकरी में थे सुधा का रूटीन भी बहुत व्यस्त रहता था। नौकरी की जिन व्यस्ताओं से छुटकारा पा कर सुधा आराम की जिंदगी जीना चाहती थी वही जिंदगी अब एक सज़ा सी लग रही थी.
सुबह के दस बज रहे थे और सुधा की नजरें बार बार अपने मोबाइल में कुछ ख़ोज रही थी। पहले तो लोगो को होली पर शुभकामनाएं देते-लेते दोपहर हो जाती थी। पर अब तो कोई याद ही नहीं करता। दिवाकर का फ़ोन तो लगभग रोज़ ही आ जाता था। परन्तु आज उसने भी फ़ोन नहीं किया। यह सोचते हुए सुधा ने दिवाकर को फ़ोन लगाया। दिवाकर शायद अभी सो कर उठा था। उसने अलसाई आवाज़ में” हैलो ” बोला । हाल चाल पूछने के बाद सुधा ने रीमा के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अभी भी सो रही थी।
“अभी तक सो रही है”- सुधा ने आश्चर्य से पूछा।
” होली की तैयारियाँ भी तो करनी है। मेहमान भी आने वाले होंगे। आज रीमा तुम्हारे लिए क्या ख़ास पकाने वाली है”- सुधा एक सांस में कई बाते कह गयी।
“मैंने तो रीमा को पहले ही कह दिया था कि अपनी कुकिंग स्किल्स दिखने के लिए त्यौहार के अलावा और भी दिन होते है। होली के दिन भागम-भाग नहीं करनी है। इसलिए जल्दी उठने की भी कोई जरुरत नहीं है। आज हम सब दोस्तों का बाहर मिलने का प्रोग्राम है। लंच भी बाहर ही करेंगे।” दिवाकर ने कहा। यह जवाब सुन कर सुधा सकपका गई और बात बदलते हुए बोली -“ओह तो यह बात है। में भी कहूँ की तुम लोगो का होली विश करने के लिए अभी तक फ़ोन क्यों नहीं आया। ”
“होली विश करने के लिए, पर आप को तो होली पसंद नहीं है न मम्मा। यू हेट प्लेइंग होली विथ कलर्स” दिवाकर की बात सुन कर सुधा को मानो कोई झटका लगा हो। उसने कुछ देर इधर उधर की बात की और फ़ोन काट दिया।
क्या सचमुच मुझे होली कहना पसंद नहीं है ?यह सोचते हुए सुधा अतीत की गहराइयों में डूबने लगी।
बचपन में सुधा को होली खेलने का बड़ा शौक़ था। सुबह-सवेरे खाली पेट ही रंग पिचकारी गुलाल ले कर सहेलियों के साथ निकल जाना और घूम- घूम कर होली खेलना। जब माँ को चिंता सताने लगती तो वह ढूंढ- ढांढ़ कर उसे लाती और खाना खिलाती। माँ उसे बहुत समझाती कि अब तू बड़ी हो गयी है। यूँ होली के दिन घूमना बंद कर दे। अब तो शादी के बाद अपने पति के घर ही होली खेलना।
शादी के बाद सुधा की पहली होली आयी। घर की एकलौती बहु होने के कारण रसोई की जिम्मेदारी उसे मिली। सुधा एक हफ्ते पहले ही तैयारियों में जुट गयी। उसने बड़े चाव से ढेरों पकवान बनाये। होली के दिन दोनों ननदें अपने परिवार समेत भाभी के साथ होली खलने मायके आयी। सुधा ने उनकी खूब खातिरदारी की। सुधा के बनाये पकवानों की सभी ने दिल से तारीफ़ की। अपनी प्रशंशा सुन कर सुधा फूली नहीं समा रही थी। नाश्ते के बाद सभी होली खेलने छत पर चले गएऔर सुधा लंच की तैयारी के लिए रसोई में घुस गयी। छोटी ननंद कई बार रसोई में आयी और सुधा से छत पर चलने की ज़िद की। पर सुधा अपने काम निपटाने में लगी रही। उसने यह कह कर ननंद को टाल दिया की उसे रंगों से खेलना पसंद नहीं है।
रसोई निपटाते निपटाते 4 बज गए। थकान से चूर सुधा भाग कर नहाने घुस गयी। नहा कर निकली तो देखा रवि दोनों हाथों में गुलाल लिए खड़ा था।
” क्या सुधा, दिन भर तुम रसोई में ही घुसी रही। मेरे लिए तुम्हारे पास समय ही नहीं है।” यह कहते हुए रवि सुधा की ओर बढ़ा। अब दुबारा नहाने की सुधा में हिम्मत न थी। उसने रवि को रोकते हुए कहा -“प्लीज रवि , माफ़ कीजियेगा। मुझे रंगों से होली खेलना पसंद नहीं है।” न जाने सुधा एक सांस में इतना बड़ा झूठ कैसे बोल गयी थी। पर यह झूठ अब उसकी जिंदगी की सच्चाई बनने वाला था।
दिन बीतते गए। जिम्मेदारियां गहराती गयी और होली के रंग फ़ीके पड़ते गए। कुछ सालों के बाद रवि का तबादला लखनऊ हो गयाऔर वे सरकारी बंगले में शिफ्ट हो गए।
सुधा बहुत खुश थी। अपने घर को सुन्दर सजा कर रखना और नए- नए पकवान बनाने का शौक़ तो उसे पहले से ही था। सोसाइटी के सभी लोग उसके घर व खाने की खूब तारीफ़ करते थे। सुधा ने अपनी छवि एक परफेक्ट हाउसवाइफ की बना ली थी। चाहे होली हो या दिवाली ,अब हर साल हर त्यौहार उन्ही के घर में मनाया जाता था।सुधा अपने घर को सजती , नए नए पकवान बनाती, सबको घूम घूम कर अपना घर दिखाती । एक पांव पर खड़े रह कर मेहमानों की खूब आवभगत करती। जहां सब लेडीज अपने परिवार -दोस्तों के साथ होली का आनंद लेती वही दूसरी ओर सुधा का ध्यान इस बात में लगा रहता कि सभी स्नैक्स सही तरीके से सर्व हुए कि नहीं। यदि कोई रंग लगाने के बढ़ता तो सुधा यह कह कर टाल देती कि उसे रंगों की होली खेलना पसंद नहीं है।
कई बार सुधा को बहुत थकान व चिड़चिड़ाहट भी होती। पर फिर भी वह अनमने मन से सब को बुलाती ताकि उसकी परफेक्ट होस्ट वाली छवि बनी रहे।
दिवाकर अब पांच साल का हो गया था। होली से दो दिन पहले ही वो अपनी कॉपी- पेंसिल और रंग लेकर कुछ बनाने में जुटा था। हर बार की तरह होली के दिन सुधा खूब तड़के उठी। सारे घर की साफ़- सफाई करवा कर अच्छे से सजाया। रसोईघर से पकवानों की खुशबू आ रही थी। मेहमानों का आगमन शुरू हो चुका तह। सुधा रंगों का थाल हाथों में ले कर गार्डन की और जा रही थी कि अचानक नन्हा दिवाकर ड्राइंगरूम के परदे के पीछे से निकला और जोर से चिल्लाया” हैप्पी होली मम्मा।” सुधा एकदम घबरा गयी और रंगो से भरी थाल उसके हाथों से छूट गयी। सिल्क के महंगे सफ़ेद परदे रंग -बिरंगे हो चुके थे। सुधा यह देख गुस्से से लाल हो गयी। उसने नन्हे दिवाकर के नरम गालों पर जोर का चांटा रसीद दिया। वो उसके छोटे छोटे कन्धों को झिंझोरते हुए बोली-” मुझे होली पसंद नहीं है। आई हेट प्लेइंग होली विथ कलर्स। ”
“पर मैं तो केवल आपको यह देना चाहता था” -कहते हुए दिवाकर ने एक कार्ड आगे बढ़ाया जिस पर लिखा था –
हैप्पी होली टू वर्ल्डस बेस्ट मम्मा।
आई लव यू
सुधा ने उसके हाथ से कार्ड छीना और सोफे पर फ़ेंक कर बाहर चली गयी। नन्हा दिवाकर भी अपने आँसू पोंछता हुआ रवि के पास गार्डन में पहुँच गया।
“ट्रिन -ट्रिन” लैंडलाइन की घंटी से सुधा की तन्द्रा टूटी। अपने अतीत को समेटते हुए सुधा उठी और उसने धीरे से अलमारी का दरवाज़ा खोला। सलीके से तह लगे कपड़ों के नीचे से उसने एक कार्ड निकला जिस पर टूटी फूटी हैंड राइटिंग में लिखा था –
हैप्पी होली तो वर्ल्डस बेस्ट मम्मा।
आई लव यू।
सुधा ने कार्ड को अपने होंठो से लगा लिया और उसकी आँखों से आंसू छलक पड़े।
बाहर ड्राइंग रूम में रवि सोसाएटी के सेक्रेटरी गुप्ता जी से फ़ोन पर कह रहे थे- “बिलकुल- बिलकुल मैं दस मिनट में नीचे पहुँच रहा हूँ। फिर होली का समारोह शुरू करते है। नहीं , सुधा नहीं आएगी। उसे होली खेलना पसंद नहीं ——–“
इससे पहले की रवि अपनी बात पूरी करता ,सुधा ने लपककर उसके हाथ से रिसीवर ले लिया और बोली-” गुप्ता जी, रवि मज़ाक कर रहे है। मुझे होली खेलना बहुत पसंद है।” रवि हैरानी से सुधा की और ताक रहा था। सुधा मुस्कुराई।
वह उसे कैसे समझाती कि यादों के रंगों के संग होली तो वह पहले ही खेल चुकी थी। अब तो बस होली के रंगो से खेलना बाकी था।