आस्था और आत्मसम्मान

नवरात्रि का पावन समय था। घर में भक्ति का वातावरण था—सुबह-शाम आरती, फूलों की सजावट, और माँ दुर्गा के भजनों की मधुर ध्वनि। घर की सभी महिलाएँ पूरे श्रद्धा के साथ व्रत रख रही थीं।

लेकिन इस बार निशा ने व्रत नहीं रखा था।

निशा एक कामकाजी महिला थी। उसका दिन सुबह 5 बजे शुरू होता—रसोई का काम, बच्चों को तैयार करना, घर की जिम्मेदारियाँ निभाना, और फिर समय पर ऑफिस पहुँचना। ऑफिस में भी वह एक जिम्मेदार पद पर थी, जहाँ हर निर्णय महत्वपूर्ण होता था।

उसने सोचा था कि इस बार व्रत रखेगी, लेकिन अपने व्यस्त और थकाने वाले रूटीन को देखते हुए उसने निर्णय लिया कि वह अपनी सेहत को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

लेकिन समाज के पास सवालों की कमी नहीं थी—
“तुम व्रत नहीं रख रही?”
“इतना भी समय नहीं है भगवान के लिए?”
“आजकल की औरतें बस काम का बहाना बनाती हैं…”

हर ताना उसके दिल को छूता था, लेकिन वह चुप रहकर मुस्कुरा देती थी।

एक दिन ऑफिस में अचानक बड़ी परेशानी खड़ी हो गई। कंपनी का एक अहम प्रोजेक्ट, जिस पर कई महीनों से काम चल रहा था, अंतिम समय पर फेल होने की कगार पर था। पूरी टीम घबराई हुई थी। उसी समय घर से फोन आया—उसके बेटे को तेज बुखार था।

एक पल के लिए निशा का मन डगमगाया। एक तरफ माँ का दिल, दूसरी तरफ जिम्मेदारी।

लेकिन उसने खुद को संभाला। तुरंत पड़ोसन को फोन किया, डॉक्टर के पास बच्चे को ले जाने की व्यवस्था की, और वीडियो कॉल के जरिए बेटे का हाल भी जानती रही।

फिर उसने ऑफिस में पूरी टीम को इकट्ठा किया, समस्या को समझा और देर रात तक काम करते हुए उसका समाधान निकाला। उसकी समझदारी और धैर्य से प्रोजेक्ट बच गया।

रात को जब वह घर लौटी, तो थकी हुई जरूर थी, लेकिन संतुष्ट भी थी। बेटे का बुखार कम हो चुका था। उसने उसे सीने से लगाया और खुद को शांत महसूस किया।

अगले दिन ऑफिस में उसकी खूब सराहना हुई। बॉस ने कहा—
“तुमने जिस तरह इस स्थिति को संभाला, वह काबिले तारीफ है।”

शाम को घर में पूजा के समय सासु माँ ने उसे पास बुलाया और प्यार से कहा—
“बेटा, तुमने व्रत नहीं रखा, लेकिन तुमने जो किया… वह किसी तपस्या से कम नहीं। असली भक्ति वही है, जिसमें कर्तव्य और समर्पण हो।”

निशा की आँखें भर आईं।

उसे अपनी माँ की कही बात याद आई—
“भगवान सिर्फ भूखे रहने से खुश नहीं होते, वे सच्चे मन और कर्म से प्रसन्न होते हैं।”

उस दिन के बाद निशा ने किसी की बातों को दिल पर लेना छोड़ दिया। उसने समझ लिया कि हर महिला की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं, और हर किसी की आस्था का तरीका अलग होता है।

वह बिना व्रत रखे भी हर दिन एक साधना कर रही थी—
अपने परिवार के लिए, अपने काम के लिए, और अपने सपनों के लिए।

वह हर दिन चुनौतियों से लड़ती है—
घर, परिवार, काम और समाज की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाते हुए…

वह थकती है, गिरती है, लेकिन फिर उठ खड़ी होती है।
वह अपने निर्णय खुद लेती है और उन पर अडिग रहती है।
वह बिना किसी दिखावे के अपनी जिम्मेदारियों को निभाती है।

और शायद यही सबसे बड़ी शक्ति है।

नवरात्रि के इन दिनों में जब हम माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि वही शक्ति हर महिला के भीतर मौजूद है—
कभी वह धैर्य बनकर सामने आती है,
कभी साहस बनकर,
और कभी जिम्मेदारी बनकर।

निशा भी ऐसी ही एक महिला है—
जो हर दिन अपने जीवन की चुनौतियों से लड़ती है,
और हर रात खुद को अगले दिन के लिए तैयार करती है।

वही असली “नारी शक्ति” है।
वही आधुनिक दुर्गा है।

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