“मैं बच गया… पर क्या सच में?”

13 अप्रैल 1919…
यह तारीख मेरे दिल पर आज भी एक गहरे घाव की तरह दर्ज है।

मैं उस दिन को कभी भूल नहीं सकता… शायद इसलिए नहीं कि मैं जिंदा बच गया, बल्कि इसलिए कि उस दिन मेरे अंदर कुछ मर गया था।

मैं, हरनाम सिंह… अमृतसर का एक साधारण युवक। बैसाखी का दिन था—खुशियों का दिन, मेलों का दिन, नए साल की शुरुआत का दिन। सुबह से ही शहर में रौनक थी। लोग अपने परिवारों के साथ हँसते-गाते, नए कपड़े पहनकर घरों से निकल रहे थे।

मुझे भी दोस्तों ने कहा—“चलो, जलियांवाला बाग चलते हैं… वहाँ सभा है।”

मैं राजनीति ज्यादा नहीं समझता था, पर सुना था कि रॉलेट एक्ट के खिलाफ लोग शांतिपूर्वक इकट्ठा हो रहे हैं। मैं भी चला गया… यह सोचकर कि अपने लोगों के बीच बैठना है, कुछ सुनना है, और फिर घर लौट आना है।

जब मैं बाग में पहुँचा, वहाँ हजारों लोग थे—औरतें, बच्चे, बूढ़े… सब। कुछ लोग भाषण सुन रहे थे, कुछ बच्चे खेल रहे थे। माहौल में कोई डर नहीं था, बस उम्मीद थी… आज़ादी की उम्मीद।

मैं अपने दोस्त गुरबचन के साथ एक कोने में बैठ गया। उसने मुस्कुराकर कहा—
“हरनाम, देखना… एक दिन हम आज़ाद होंगे।”

मैं भी मुस्कुरा दिया… पर हमें क्या पता था कि अगले कुछ मिनटों में हमारी दुनिया हमेशा के लिए बदलने वाली है।

अचानक…
एक अजीब-सी हलचल हुई।

हमने देखा कि एक संकरी गली से अंग्रेज़ सिपाही अंदर आ रहे हैं। उनके पीछे-पीछे एक कठोर चेहरा… जनरल डायर।

पहले तो लगा कि शायद वे हमें तितर-बितर होने को कहेंगे…
पर उन्होंने बिना किसी चेतावनी के…
गोलियां चलाने का आदेश दे दिया।

और फिर…
धाँय… धाँय… धाँय…

गोलियों की आवाज़ ने पूरे बाग को दहला दिया।

लोग चीखने लगे…
“भागो!”
“बचाओ!”

पर भागने का कोई रास्ता नहीं था। चारों तरफ ऊँची दीवारें थीं, और एक ही संकरा दरवाज़ा—जहाँ से वही सिपाही खड़े थे।

मैंने देखा… मेरे सामने एक माँ अपने बच्चे को सीने से लगाए खड़ी थी।
अचानक एक गोली आई…
और वह माँ वहीं गिर पड़ी।

बच्चा रोता रहा… “माँ… माँ…”

पर उसकी माँ अब कभी जवाब नहीं देने वाली थी।

मेरे दोस्त गुरबचन ने मेरा हाथ पकड़ा—
“नीचे लेट जा!”

हम दोनों जमीन पर लेट गए।
पर गोलियां… जैसे आसमान से बरस रही थीं।

मैंने अपने चारों तरफ देखा—
लोग एक-दूसरे पर गिर रहे थे…
खून की नदियाँ बह रही थीं…
चीखें… कराहें… हर तरफ मौत का सन्नाटा बनाती जा रही थीं।

कुछ लोग दीवार चढ़ने की कोशिश कर रहे थे…
पर गोलियां उन्हें वहीं गिरा देती थीं।

कुछ लोग उस कुएं की तरफ भागे…
मैंने अपनी आँखों से देखा—
लोग जान बचाने के लिए कुएं में कूद रहे थे।

पर वह कुआं…
अब जीवन नहीं, मौत का कुआं बन चुका था।

मैंने गुरबचन की तरफ देखा…
वह मुझे कुछ कहना चाहता था…
पर तभी एक गोली उसके सीने में लगी।

उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा…
और फिर… उसकी पकड़ ढीली हो गई।

मैं चीखना चाहता था…
पर मेरी आवाज़ जैसे गले में ही अटक गई थी।

मैं वहीं पड़ा रहा…
मरे हुए लोगों के बीच…
खून से सना हुआ…

गोलियां चलती रहीं…
लगभग 10 मिनट तक…

पर वो 10 मिनट…
जैसे सदियों से भी लंबे थे।

जब गोलियां रुकीं, तब बाग में एक भयानक सन्नाटा था।

मैं धीरे-धीरे उठा…
मेरे चारों तरफ सिर्फ लाशें थीं।

वे सिर्फ लाशें नहीं थीं…

वे थे—
दर्द…
जो हर घर में पहुँचने वाला था।

वे थे—
अनाथ बच्चे…
जिन्हें अब कोई “बेटा” कहकर नहीं पुकारेगा।

वे थे—
सिसकती हुईं विधवाएं…
जिनकी दुनिया एक पल में उजड़ गई थी।

मैं लड़खड़ाते हुए बाहर निकला।

शहर में खबर फैल चुकी थी।
हर घर में मातम था।

मैं अपने घर पहुँचा…
मेरी माँ ने मुझे देखा… और गले लगा लिया।

पर मैं…
मैं अब वही हरनाम नहीं था।

उस दिन मैंने सिर्फ लोगों को मरते नहीं देखा…
मैंने इंसानियत को मरते देखा था।

आज, इतने सालों बाद भी…
जब भी 13 अप्रैल आता है,
मेरे कानों में वही आवाज़ गूंजती है—
धाँय… धाँय…

और मैं फिर से वहीं पहुँच जाता हूँ…
उस बाग में…
जहाँ मैं बच तो गया…

पर क्या सच में बच पाया?

क्योंकि उस दिन…
जलियांवाला बाग में सिर्फ लोग नहीं मरे थे…

मर गई थी—
हमारी मासूमियत…
हमारा भरोसा…
और इंसानियत का एक बड़ा हिस्सा।

और शायद…
मेरे अंदर का एक हिस्सा भी।

– हरनाम सिंह (एक गवाह)

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