कुशन कशीदाकारी भरे: Hindi Poem on Empty Nest Syndrome (एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम)

समय है कि काटे नही कटता ,

मन अब मेरा कहीं नही लगता।

कुछ बरस पहले तक तो वक्त ही नहीं था अपने लिए ,

खिंच तान कर एक दिन कशीदाकारी भरे कुशन सिये। 

यह खाओ , यह मत करो , ज्यादा टीवी मत देखो ,

सुबह जल्दी उठना है ,कोई वक्त पर क्यों नहीं सोता ?

हर समय बच्चो पर चिल्लाती कि घर गंदा मत करो , हर चीज जगह पर रखो ,

इधर उधर  बिखरे कुशन देखकर मेरा पारा सातवें आसमान पर होता।

पूरे दिन इकट्ठी करती रहती  इन्ही शिकायतों की पोथी ,

जिसे पति देव के सामने परोसकर ही थी सोती। 

कुछ सालों में बच्चे अपनी पढाई और नौकरी में खोने लगे ,

अब ये भी ओफिस से आकर खाना खाकर जल्दी सोने लगे ।

बहुत समय बाद घर , घर लगने लगा था ,

क्योंकि अब सब मेरे हिसाब से चलने लगा था। 

किटी पार्टी डाली,सोशल सर्कल बनाया ,

अब सहेलियों के बताए सीरियल मैं देखकर खुश होने लगी थी। 

कुछ साल बीते इसी दिनचर्या में ,

अब मुझे अपनी जिन्दगी बहुत अच्छी लगने लगी थी ।

अब हर चीज जगह पर रहती थी , बच्चे अपना रूम खुद ही साफ करने लगे थे ।

अखबार के बिखरे पन्ने भी अब सलीके से ,अलमारी के एक कोने मे लगने लगे थे ।

अब घर में शोर नहीं होता ,ना चादर पर कोई सिलवट पाती , 

पर जाने क्योँ अब खाली घोसलें की  खामोशी नहीं सुहाती ?

ड्राइंग रूम से गुजरते हुए कुशनों को देखा करती हूँ ,

जो हमेशा तरीके से सोफे पर सजे रहते है , 

 मेरे चेहरे की रौनक अब कहां चले गयी ?

 मुझे चिढाते हुए ये कहते हैं। 

हर समय मोबाइल उठा मैसेज चैक करती ,

फोन की रिगं बजे या डोर बैल ,सब काम छोडकर भागती हूँ। 

न सुबह जल्दी उठने की कोई  वजह है ,

अब रात भर मैं जागती हूँ। 

इन्तजार करती हूँ कि कोई आएं ,फैलाएं उन कुशनो को, खिलौनों को,कपड़ों को ,और मुझसे बात करे । 

पर दूर दूर तक कोई नहीं , बस रह गए है मैं और मेरे  कुशन कशीदाकारी भरे। 

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