सफर: उस सफर ने सीमा औरअन्वी को क्या सबक दिया

रात की ट्रेन थी। प्लेटफॉर्म पर हल्की ठंडक और भागदौड़ का शोर था। सीमा अपनी सोलह साल की बेटी अन्वी के साथ जल्दी-जल्दी कोच में चढ़ी। सीट मिल गई थी—साइड लोअर और साइड अपर। उन्होंने चैन की सांस ली। शहर से गाँव तक का आठ घंटे का सफर था।

ट्रेन चलने लगी तो सामने की बर्थ पर चार-पांच जवान लड़कों का ग्रुप आकर बैठ गया। वे शायद किसी कॉलेज टूर से लौट रहे थे—हंसी-मज़ाक, ऊँची आवाज़ में बातें, मोबाइल पर गाने। शुरुआत में सब सामान्य लगा, पर धीरे-धीरे सीमा को बेचैनी होने लगी। लड़कों की निगाहें बार-बार उनकी तरफ उठ जातीं, और फिर आपस में कुछ कहकर हंस देते।

अन्वी ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया। “माँ, मुझे अच्छा नहीं लग रहा,” उसने धीरे से कहा।

सीमा ने मुस्कुराने की कोशिश की, “डरने की बात नहीं है बेटा, हम साथ हैं।” पर उसके भीतर भी डर की एक रेखा खिंच चुकी थी। वह समझ रही थी कि असुरक्षा हमेशा किसी घटना से नहीं, माहौल से भी पैदा होती है—और यह माहौल ठीक नहीं था।

कुछ देर बाद लड़कों में से एक ने ऊँची आवाज़ में कहा, “आंटी, खिड़की बंद कर दीजिए, हवा तेज़ है।” बात सामान्य थी, पर लहजा ऐसा कि सीमा को असहज लगा। उसने बिना कुछ कहे खिड़की खिसका दी। अन्वी ने ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ना चाहा, पर उसे डर था कि नीचे माँ अकेली रह जाएगी।

सीमा ने आसपास नज़र दौड़ाई। उसी डिब्बे में एक बुज़ुर्ग दंपती और दो-तीन और यात्री थे, पर वे सब चुप थे—जैसे किसी ने अनकहा समझौता कर लिया हो कि “हमें क्या लेना-देना।” यही चुप्पी सीमा को सबसे ज़्यादा खल रही थी।

उसने मोबाइल निकाला और हेल्पलाइन नंबर ढूंढा। रेलवे सुरक्षा हेल्पलाइन 139 पर संदेश भेज दिया—कोच नंबर और स्थिति लिखकर। साथ ही, उसने पास बैठे बुज़ुर्ग अंकल से विनम्रता से कहा, “भैया, अगर आप नीचे बैठ जाएँ तो मुझे थोड़ा साहस मिलेगा।” अंकल तुरंत उठकर उनके पास आ गए। उनकी पत्नी भी मुस्कुरा कर बोलीं, “बेटी, चिंता मत करो।”

शायद सामूहिक उपस्थिति का असर था या फिर लड़कों ने स्थिति भांप ली—उनका शोर कम हो गया। थोड़ी देर में टीटी और एक आरपीएफ जवान भी कोच में आए। उन्होंने सामान्य जांच की और लड़कों को संयमित रहने की सख्त हिदायत दी। वातावरण बदल गया। वही डिब्बा जो कुछ देर पहले डर का कारण था, अब अपेक्षाकृत सुरक्षित लगने लगा।

अन्वी ने राहत की सांस ली। “माँ, आपने सही किया,” उसने कहा।

सीमा ने उसके बाल सहलाए। “डर लगना गलत नहीं है, बेटा। गलत है चुप रह जाना। हमें अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठानी चाहिए।”

सुबह जब ट्रेन स्टेशन पर रुकी, सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आईं। सीमा ने सोचा—समस्या सिर्फ कुछ लड़कों की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो महिलाओं को असहज करती है और दूसरों को चुप रहने पर मजबूर। लेकिन समाधान भी यहीं है—जागरूकता, साहस और साथ खड़े होने की भावना में।

उस सफर ने माँ-बेटी को एक सबक दिया: सुरक्षा सिर्फ इंतज़ार से नहीं, पहल से आती है। और जब एक आवाज़ उठती है, तो कई हाथ सहारा देने के लिए आगे बढ़ते हैं।

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