सीमा के हाथ में मोबाइल था।
स्क्रीन पर रील्स चल रही थीं, उंगलियाँ स्क्रॉल कर रही थीं, और समय चुपचाप आगे बढ़ रहा था।
“मम्मा, देखो मैंने क्या बनाया!”
आठ साल की आर्या रंगों से भरी कॉपी लेकर सामने खड़ी थी।
“अभी नहीं बेटा… मम्मा बिज़ी है।”
सीमा ने बिना ऊपर देखे जवाब दिया।
आर्या धीरे से मुड़ गई।
सीमा पहले ऐसी नहीं थी।शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी थी। धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि उसकी दुनिया बस रसोई और सफाई तक सीमित है।मोबाइल उसके लिए एक खिड़की बन गया — जहाँ लोग उसकी तस्वीरों पर लाइक करते, उसकी रेसिपी की तारीफ करते, उसकी पोस्ट शेयर करते।
उसे लगता — “कम से कम यहाँ तो मेरी पहचान है।”
लेकिन उसी पहचान की तलाश में, वह अपनी असली पहचान खो रही थी — “माँ”।
एक शाम स्कूल से कॉल आया।“मैम, आर्या आज फिर अकेली बैठी रही। उसने कहा कि घर पर भी उससे कोई बात नहीं करता।”
सीमा को झटका लगा।“कैसी बात कर रही है? मैं तो पूरे दिन घर पर रहती हूँ!”
रात को अमित ने धीरे से कहा,
“घर पर रहना और साथ होना अलग बात है, सीमा।”
सीमा चुप रही।लेकिन अगले ही पल उसका फोन बजा — एक नया नोटिफिकेशन।
उसने फिर स्क्रीन खोल ली।
कुछ दिनों बाद…
सीमा किचन में थी, मोबाइल हाथ में।
आर्या बालकनी में खेल रही थी।
“मम्मा, देखो मैं कितनी ऊँचाई तक चढ़ गई!”
“हाँ-हाँ, गिरना मत…” सीमा ने बिना देखे कहा।
अचानक एक जोरदार आवाज आई।
धड़ाम!!!
सीमा के हाथ से फोन गिर गया।
वह भागी… बालकनी खाली थी।
नीचे लोगों की भीड़ लगी थी।उसकी दुनिया… एक सेकंड में साइलेंट हो गई।
अस्पताल के बाहर बैठी सीमा के हाथ काँप रहे थे।
मोबाइल उसके बैग में पड़ा था — साइलेंट मोड पर।
डॉक्टर बाहर आए।
“अगर पाँच मिनट पहले लाया होता तो शायद…”
सीमा के कानों में बस वही शब्द गूंजते रहे —
“पाँच मिनट पहले…”
वही पाँच मिनट, जो उसने एक रील पर हँसते हुए गंवा दिए थे।
कुछ महीनों बाद,सीमा के सोशल मीडिया अकाउंट पर एक आखिरी पोस्ट थी —
आर्या की पुरानी तस्वीर।
कैप्शन में लिखा था:
“फोन कभी भी बाद में देखा जा सकता है…
लेकिन अपने बच्चे को देखने का मौका दोबारा नहीं मिलता।”
अब उसके फोन पर नोटिफिकेशन नहीं आते।
वह खुद हर माँ के घर जाकर बस एक बात कहती है —
“ऑनलाइन रहना गलत नहीं…
लेकिन अगर आपकी वजह से आपका बच्चा ऑफलाइन हो जाए,
तो यह सबसे बड़ी गलती है।”