रीमा और आरव की शादी अरेंज मैरिज थी।
न कोई फिल्मी प्यार, न लंबे वादे। बस एक साधारण-सा रिश्ता।
शादी के बाद रीमा नए शहर आई।
सब कुछ नया था — घर, लोग, माहौल… और आरव भी।
आरव शांत स्वभाव का था। कम बोलता, ज्यादा समझता।
रीमा बातूनी थी। सपनों से भरी हुई।
शुरुआत के दिनों में दोनों के बीच छोटी-छोटी गलतफहमियाँ होती रहीं।
रीमा सोचती — “उसे मेरी परवाह नहीं।”
आरव सोचता — “उसे मुझसे शिकायत है।”
एक दिन रीमा बीमार पड़ गई। तेज बुखार।
आरव ने ऑफिस से छुट्टी ली। दवा दी, खिचड़ी बनाई, माथा सहलाता रहा।
आधी रात को रीमा ने धीरे से पूछा,
“आप इतना ख्याल क्यों रख रहे हैं?”
आरव मुस्कुराया,
“क्योंकि… तुम मेरी हो।”
रीमा चुप रही।
उस रात पहली बार उसे लगा — वह अकेली नहीं है।
दिन बीतते गए।
अब झगड़े भी होते, तो अंत में दोनों हँस पड़ते।
एक शाम बिजली चली गई।
मोमबत्ती की हल्की रोशनी में रीमा ने कहा,
“अगर मैं कभी कमजोर पड़ जाऊँ तो…?”
आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“तो मैं संभाल लूँगा। क्योंकि मैं तेरा हूँ।”
रीमा की आँखें नम हो गईं।
“और अगर आप कभी हार गए तो?”
“तब तुम मुझे याद दिलाना — कि तू मेरी है।”
उस दिन दोनों ने समझा —
रिश्ता सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं,
बल्कि एक-दूसरे का सहारा बनने का नाम है।
प्यार हमेशा बड़े शब्दों में नहीं होता।
कभी-कभी वह बस इतना होता है —
जब एक कहे,
“मैं तेरा…”
तो दूसरा बिना झिझक जवाब दे —
“तू मेरी।”
और फिर दोनों साथ कहें —
“तू मेरी, मैं तेरा।” 💖